Wednesday, October 24, 2018

ग़ज़ल - 81

वो है एक बदगुमानी, और क्या है
मेरे ख़्वाबों से छेड़खानी और क्या है

सुबह दफ़्तर, शाम को घर
रोज़मर्रा की परेशानी और क्या है

सारी आरज़ू-ओ-आबरू-ओ-जुस्तजू लूटकर
पूछते हैं वो जानी, और क्या है

मुझको छूकर अक्सर जल जाया करते हैं
राख में अंगारे की निशानी और क्या है

सच देखती है सच बोल नहीं सकती
इक कलम की बेज़ुबानी और क्या है

बे-वक़्त बोलना, बे-वक़्त चुप रहना
ज़िन्दगी की पशीमानी और क्या है

'जौन' से आख़िरी बार मिली वो कहकर
इश्क़ जावेदानी है, और क्या है

Thursday, October 11, 2018

अकेले शेर - 23

बीमार हैं चारासाज़ी के ग़ुलाम हैं
हम फ़क़त अपने माज़ी के ग़ुलाम हैं

हारने वालों ने घुटने नहीं टेके
जीतने वाले बाज़ी के ग़ुलाम हैं

Tuesday, October 9, 2018

जन्मदिन

जन्मदिन, एक और दिन...
पर मैं तो गर्भ में भी ज़िंदा था
क्या उस दिन मेरा जन्मदिन था जब मैं पहली बार भ्रूण बना
या उस दिन जब उसमें आत्मा प्रविष्ट हुई
या फिर उस दिन जब मैंने पहली बार गर्भ में हरकत की

पर जन्मदिन मेरा है या इस आवरण का जिसे हम शरीर कहते हैं
यह तो इसपे निर्भर करता है कि हम स्वयं को किससे इंगित करते हैं

युग के अंत में सृष्टि की पुनरावृत्ति होती है
तो क्या हर युग की शुरुआत में मेरा जन्मदिन है

पर आत्मा तो युगातीत भी है
तो क्या मेरा जन्म रचयिता का भी जन्मदिन है
क्या हम और रचयिता एक ही हैं?

Sunday, October 7, 2018

ग़ज़ल - 80

बू-ए-ज़मीं से बारिश का पयाम गुज़र जाना
जैसे तेरे लबों से मेरा नाम गुज़र जाना

कटती है कुछ इस तरह ख़्वाबों में ज़िंदगी
नींद में हक़ीक़त का अंजाम गुज़र जाना

कुछ ऐसा है मुझपर तेरे ख़यालों का मो'जिज़ा
मौज-ए-मशक़्क़त में भी आराम गुज़र जाना

देखती हैं उदास आँखें दरवाज़े और दरीचे की
तेरा मेरी गलियों से गुमनाम गुज़र जाना

तेरी सोहबतों में दिन ढले रक़ीब का, और मेरा
तेरे तसव्वुर में बैठना और शाम गुज़र जाना

भला इंसान था मारा गया सियासी उलझनों में
दुनिया में ऐसे वाक़िओं का तमाम गुज़र जाना

Sunday, September 30, 2018

ग़ज़ल - 79

चमन के सभी गुल धानी के नहीं हैं
मेरे ख़यालात सभी मआनी के नहीं हैं

तुझको देख लेता हूँ तो फिर ये सोचता हूँ
मेरे मसलात सभी परेशानी के नहीं है

तूने देखे हैं बोहोत दर्द के मारे हुए लोग
तेरे तजुर्बात मेरी ज़िंदगानी के नहीं हैं

हमने देखा है इक मज़लूम की आँखों में लहू
जहाँ में अश्क़ सभी पानी के नहीं हैं

और वो हँसी ख़ुशी साथ रहने लगते हैं
ऐसे वाक़िए मेरी कहानी के नहीं हैं

Friday, September 21, 2018

अकेले शेर - 22

दिल ने फिर से कर दी इक अय्यारी है
शायद पूरी मरने की तय्यारी है

मुझको इश्क़ दोबारा हो चला है
मुझको एक जानलेवा बीमारी है

Thursday, September 20, 2018

अकेले शेर - 21

मेरी दास्तान-ए-ज़िन्दगी की बस यही तस्वीर है
मैं तेरा किरदार हूँ पर तू मेरी तहरीर है

इस दास्ताँ में चल रहीं हैं दो कहानियाँ बराबर
इक मेरी ताबीर है और इक तेरी तक़दीर है

Wednesday, September 12, 2018

अकेले शेर - 20

सिर्फ़ मुद्दे उठाना ही उनका इरादा है
सवाल की अहमियत जवाब से ज़्यादा है

इक तरफ़ वंश का स्थापत्य उनका सत्य है
इक तरफ़ देखिए तो राजा ख़ुद प्यादा है

Sunday, September 9, 2018

अकेले शेर - 19

है जो तेरे रुख़सार की पहरेदारी में एक तिल
जैसे किसी के हसीन असरार ज़ब्त किए हो एक दिल

चाँद सँवरता ख़ुद को देख कर सागर के आईने में
सागर की तफ़्सीर में सारे रूप चाँद के हैं शामिल

Monday, September 3, 2018

ग़ज़ल - 78

गोशे-गोशे में मचलती है
वो ख़ुशबू कहाँ सँभलती है

उसके साँसों की हरारत से
सीने की बर्फ़ पिघलती है

मेरे होंठों से लग कर वो
मेरे अंतस में फिसलती है

मैं उसके क़रीब आ जाता हूँ
जब दिन होता, शामें ढलती हैं

#चाय

Sunday, August 26, 2018

अकेले शेर - 18

बा-हताश आदम सा जन्नत के दर से लौटे हैं
हाँ हम अभी छुट्टी मना कर घर से लौटे हैं

Wednesday, August 15, 2018

अकेले शेर - 17

जहाँ अहल-ए-वतन तहज़ीब-ओ-रिवायत की तामील में फ़ाज़िल है
असल मायने में वो ही मुल्क़ आज़ादी का हासिल है

परतंत्र रहे, बलिदान दिया, अपने मौलिक अधिकार लिए
पर अपनी संस्कृति तक जाना ही आज़ादी की मंज़िल है

Friday, August 10, 2018

अकेले शेर - 16

तीरगी का अक्स और ख़ामोशी की सुनवाई
ज़िन्दगी के कहकशाँ में गूंजती है तन्हाई

बे-इंतिहाई भी है ख़ुदा का एक रंग
सो अपने वीराने में हमने पाई मसीहाई

Saturday, August 4, 2018

ग़ज़ल - 77

दुनिया की ज़ात से परे होकर
मिल रहे दो पंछी हरे होकर

ये दुनिया बट चुकी है अब ख़ानों में
सो वो मिलते हैं इक दूजे से डरे होकर

अभी इक पैग़ाम लाई है सबा
मिले कल रात दो पंछी मरे होकर

Wednesday, August 1, 2018

ग़ज़ल - 76

वो किस्सा अधूरा छूट गया था
इक लम्हा वक़्त से टूट गया था

वो फिर मुझे न आया मनाने
इक बार मैं उससे रूठ गया था

उसके शहर-ए-उल्फ़त का उजाला
मेरी बीनाई लूट गया था

उसकी ख़ुशी में आँसू ढलके
अमृत का इक घूँट गया था

मैं तो पहले ही मर चुका था
अख़बारों में झूठ गया था