याद है तुम्हें
हम दोनों अक्सर दर्शन-शास्त्र की चर्चा करते थे
हम दोनों अक्सर दर्शन-शास्त्र की चर्चा करते थे
मैं तत्वज्ञान की बातें करता और तुम सौन्दर्य-शास्त्र की
मैं पूछता कि इस ब्रह्माण्ड के परे क्या है
ये किस दायरे में स्थापित है, इसका फ्रेम ऑफ रेफ़रेंस क्या है
तुम कहती के इस फूल को देखो
इस नदी का नाद सुनो
मैं पूछता के ये समय क्या है, इसकी गति क्या है
तुम कहती, ये उगता सूरज कितना शाश्वत लगता है
मैं पूछता कि हमारी व्युत्पत्ति का कारण क्या है
तुम कहती, अकारण स्वयं में ही कितना ख़ूबसूरत है
अब तुम नहीं हो
तो मैं सुध करता हूँ उन चर्चाओं की
शायद, मेरे ये सारे प्रश्न केवल इसलिए थे
के तुम सौन्दर्य की बातें करो
कोमलता की
हृदयात्मकता की
जो अभी है उसके श्रेष्ठतम अनुभूति की
होने के उस आयाम की जो काल के परे है
आकर देखो तो कभी तुम
कितने सवालों के बीच, निरुत्तर पड़ा हूँ मैं
- अम्बुज
Written: May, 2022