Sunday, April 19, 2015

ग़ज़ल - 5

कोई ग़म दे गर तो क्या कीजे
रात-दिन चस्म-ए-तर कीजे

समंदर पार ही रहता है क़ातिल
समंदर पार ही कैसे कीजे

बड़ी सादगी से कह दिया उसने
"आप अब हमें भुला दीजे"

ये तो फ़ितरत-ए-हुस्न है गोया
अब तो आप बस दुआ कीजे

उससे इक जनम का वास्ता ठहरा
अब अगली बार जनम लीजे 

Sunday, December 7, 2014

सब बराबर है

सब बराबर है ।

भोग में वैराग में,
वियोग में या राग में,

दुःख हो, सुख हो इस क्षण,
अगले ही क्षण,
सब बराबर है ।

हास्य में बीत रहा या गहन शान्ति में,
स्पष्ट सब दिख रहा या गहन भ्रान्ति में,
पाप में बीत रहा या पुण्य में,
दूर का हो ध्येय या फिर शून्य में,

गुण-अवगुण, निर्गुण-सर्गुण,
अगले ही क्षण,
सब बराबर है ।

कोई प्रीत के सागर में डुबकी लगाये,
या कोई एकाकीपन के रस में नहाये,
कोई भाव-सागर को पार करे,
कोई मृग-जल को ही पाँव धरे,

सूखे तो सब ही रह जाते,
पराजय तो अंत में सभी पाते,

जय-पराजय, यश-अपयश,
अगले ही क्षण,
सब बराबर है ।

परन्तु कब समझेंगे यह,
के प्रयोजन तो कुछ भी नहीं,

चेष्ठा तो केवल उसी की है -
वह जो हो तो कुछ और नहीं रहता
वह जो न हो तो कुछ नहीं रहता ।

अब भूल जाओ इसे, या याद ही रखो,
अगले ही क्षण,
सब बराबर है । 

Thursday, December 4, 2014

ग़ज़ल - 4

मेरी आँखों में देख कर सँवर लो तुम
मेरे होंठों पे नज़्म सी बिखर लो तुम

है ख़ानाबदोश ये इश्क़-ए-सफर
मेरे घर को अपना घर कर लो तुम

मेरी बे-ख्वाब रातों को अपनी रात
मेरी सेहर को अपनी सेहर कर लो तुम

यूँ जो दिल बहलना हो जाए दुश्वार
मेरा ख़ून-ए-जिगर कर लो तुम !

मैं दौलत-सरा तो नहीं, ना सही
मेरा नसीब अपनी नज़्र कर लो तुम

यूँही कभी-कभी मेरा नाम लेकर
दुनिया से जिरह कर लो तुम

और जब नादामतों पे अपनी हो जाओ मायूस
मेरे काँधे पे अपना सर कर लो तुम 

Saturday, September 20, 2014

आज लहरें खामोश हैं

आज लहरें खामोश हैं ।

कल यूँ उठती थीं मानो, मुझतक पहुँचने की जल्दी थी
कोई पैगाम छुपा था अंतर-गर्भ में, बतलाने की जल्दी थी

कल शोर यूँ बरपाती थीं, मानो बच्चियाँ चहकती हों
चाँद नहीं खींचता इनको, ये खुद ही पाने को लपकती हों

पर आज ये कैसा खालीपन इन्मे, लहरें सूखी-सूखी हैं
रंग-ढंग सब बिगड़ चुका, आवाज़ें रूखी-रूखी है

आज ये तट पर ऐसे आतीं, मानों अश्रु की कुछ बूँदें हों
कोई गहरा सन्नाटा ओढ़े, सागर आँखें मूंदें हो

कल से आज में, कुछ बदल तो गया है
लहरें शांत नहीं हुईं, समुद्र मर गया है । 

Monday, May 26, 2014

ग़ज़ल - 3

खाली पन्ने यादों के, पलट के देखता हूँ 
तेरे बिताये लम्हों कि मरघट को देखता हूँ 

मोहब्बत, अक़ीदत, वफादारी, लाचारी,
मैं मुड़ के बस तेरी नीयत को देखता हूँ 

ये हीर, ये रांझे, महिवालों के किस्से,
इन किस्सों मे बस, गोया, कैफ़ियत को देखता हूँ 

शब-ए-वस्ल-ओ-सेहर-ए-हिज्राँ 
मैं इन के दरम्याँ कि मुद्दत को देखता हूँ 

Monday, February 13, 2012

ग़ज़ल - 2

बस इसी हकीकत से दिल-ओ-जाँ सिहर गए हैं
ज़िन्दगी गुजर रही है, लम्हे ठहर गए हैं |

इक वाकया है ज़िन्दगी, जो केह भी दूँ तो ख़त्म हो
पर गले की फाँस है, हम जिससे डर गए हैं |

सब लोग केह रहे हैं की मेरे अलफ़ाज़ खार हैं
तेरे छुअन की तपिश से मेरे होंठ जल गए हैं |

अब क्या हिसाब, ज़िन्दगी कफ़स तेरे जाने के बाद
चेहरा बिगड़ गया है, क़ायदे सँवर गए हैं |

तू ही था खुदावंद, जो खुदा रूठे तो क्या रूठे
सब यार रूठ-रूठ कर, अपने-अपने घर गए हैं |

अब देखूं तो क्या, पाऊँ तो क्या, सोचूँ-सम्भालूँ बचाऊँ तो क्या
इनके लिए जो चाहिए वो जज़्बात मर गए हैं |

Tuesday, September 20, 2011

ग़ज़ल - 1

गुल-ए-चमन की निगाहों से गुज़रते जाना
बहारों की मौसिक़ी पे फ़िसलते जाना

हर एक राह पहुँचाती वहीं है
जिस दिशा भी जाना, झिलमिलाते जाना

बे-ताल्लुकी से जीने में कोई सार नहीं है
हर एक पत्थर पे हाथ फिराते जाना

हर एक यारी इक मुकाम रखती है
गर पड़े कूचा-ए-यार तो ठहरते जाना

याद रखना के इक दिल भी पड़ा है सीने में
कभी अपनी समझदारी से भी इतर जाना

साक़ी-ओ-वाइज़ के दर्जे बराबर हैं
मस्जिद-ओ-मैखाने पे सर झुकाते जाना

Friday, August 5, 2011

अकेले शेर - 3

कुछ खेल लकीरों का है, कुछ अपनी बिसात भी
कुछ ज़ख्म हबीबों का है, कुछ अपनी सौगात भी
वो तोड़ गया मेरे अक्स को शीशे की तरह
उस आईने में देख ली, हमने अपनी औकात भी

Friday, July 29, 2011

अकेले शेर - 2

मेरी मजबूरियों को मेरा पैमाना न समझ
उजड़ना ही बस्तियों का फ़साना न समझ
गर देख सके तो झाँक मेरी आँखों के तले
मेरे आज से मेरे कल का ज़माना न समझ

Wednesday, July 6, 2011

इक ऐसी भी शाम हो...

शाम हो, जाम हो, सुबू भी हो,
कुछ बिछड़े यारों का समूह भी हो |

कुछ बीती बातों के किस्से चलें,
कुछ पुराने गीतों की बू भी हो |

कुछ पेचीदा मसलों के हल भी निकलें,
कुछ रूमानियत भरी गुफ्तगू भी हो |

कुछ खिलखिलाहट की लड़ियाँ जो ख़त्म न हों,
कुछ अश्कों की बूँदें कभी शुरू भी हों |

कुछ बे-तकल्लुफ अंदाज़ में बातें करें,
फिर बीच में कभी शायरी-ए-उर्दू भी हो |

कुछ मीठी यादों से मन महके,
बागों में हरसिंगार की खुशबू भी हो |

उस शाम को संजो के रखें हम,
जहाँ ये भी हो, वो भी हो, और तू भी हो |

अकेले शेर - 1

वो मुझसे बिस्मिल है तो क्योंकर है,
नदी भी पर्बतों से होकर है,
इस आशनाई का अब मैं क्या करूँ,
हमने अज़ीज़ों से खायी बोहत  ठोकर है |

Saturday, February 26, 2011

तमन्नाएं

तमन्ना थी के पाना है सूरज को,
घर से ज़रा सवेरे निकला था,
जाने किस राह देर हो गयी,
दुपहरी के सूरज ने हाथ जला दिए |

सोचते थे के क्या है ये सागर,
डुबकी मारने की ही तो दरकार है,
पार ही कर लूँगा, तैराक अच्छा हूँ,
अब तक आँखों से टपकता है खारा पानी |

मिला था एक गुल का सानिध्य,
पर मैं तो ठहरा भँवरा,
एक फूल से मेरी संतुष्टि कहाँ,
अब गुंजन ही बन गया है जीवन - क्रंदन |

Tuesday, February 15, 2011

सौंधा सा प्रेम

सौंधा सा प्रेम,
उमड़ पड़ता है,
निगाहों की छींटाकशी पे |

कभी यकबयक, रेंगता हुआ,
अदृश्य से उठता है,
और बुन देता है रेशमी जाले |

कभी बिलखता भी है,
छोटी-छोटी बातों पर,
और पावन कर जाता है दिलों के मेल |

कुछ निराली बात है,
इन प्रेम-वल्लरियों की,
उर्वर कर जाती हैं पाषण ह्रदय को |

सच, सौगात ही है,
प्रीत-कुसुम का खिलना,
निस्स्पंद जीवन में सुवास का मिलना |

Thursday, January 20, 2011

तलाश

कभी यूँ भी लगता है, क्यूँ जियें
फरेब-ए-हयात-ए-मय, क्यूँ पियें
ना इल्म-ए-हस्ती, ना मर्ग-ए-वाकिफ़
फिर चाक गिरेबाँ, क्यूँ सियें

यूँ झूठ ही तो है, जो सब जाना
ना-वाकिफ़ हूँ उससे, जो है पाना
क्या जिंदगी का मकसद, क्यूँ जिंदगी का मकसद
झूठा है खुदा, झूठा पैमाना

क्या राज़-ए-खुल्द, रूह-ए-निहाँ
जाना कहाँ, हूँ मैं हैराँ
कहते हैं तूने, बनाया हमें
किसने तुझे, कुछ दे जबाँ 

दिनांक : 21/01/2011

Sunday, August 30, 2009

नया सफ़र

इस रात ने किया है, आगाज़ नये सफ़र का
उन्नींद आँखें अब जगीं, अरसा गुज़रा इक उमर का

कारवाँ जो साथ था, जाने कहाँ वो खो गया
पाथेय की उमंग मे, जाने कहाँ मैं सो गया

अब क्या सुनाऊं वो दास्ताँ, जिसकी बची न कुछ राख भी
ना दर्द है, ना कोई खुशी, निरपल्लव जिसकी शाख भी

गर्दिश के सितारों का, अब मोल कुछ नही
जब रौशनी को अपनी, मंज़िल की सुध नही

पर इस नये सफ़र मे, दोहराव नही होगा
अब चाँद-सितारों से भी, अलगाव सही होगा


दिनांक:  नवंबर, 2007